Yusuf

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कच्चा बचपन


कच्चा बचपन!

घर कच्चे-दहलीज थी कच्ची,छत-और-रसोई कच्ची थी,
लिपा-पुता कच्चा आंगन था,.....पर बुनियादें सच्ची थी।

खेत-गली-चौबारे-कच्चे,..........कच्ची घर की बख्खारी,
रिश्तों में मजबूती पक्की,....अपनों की यादें सच्ची थी।।

मिट्टी में वो झूठे झगड़े,...........मिट्टी जैसे शिकवे-गिले,
रुठना-लड़ना-फिर मिल जाना,.वादे-दोस्ती सच्ची थी।।

कच्ची आंखो के वो सपने,...भले आज तक बस सपने,
ना थी हकीकत जमीं की उनमें,पर फरियादें सच्ची थीं।।

छूटा वो आंगन-गांव भी छूटा,...कच्ची उमर पीछे छूटी,
लेकिन भूल ना पाये उनको,..यादें वो इतनी अच्छी थीं।।

छूलें फलक को आज भले हम,....जुड़ें रहे बुनियादों से,
जड़ से कटकर नियति सूखना,बातें ये कितनी सच्ची थी।।


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5 Comments

Gunjan Kamal

20-Feb-2024 03:06 PM

👏🏻👌🏻

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Mohammed urooj khan

19-Feb-2024 11:30 AM

लाजबाब 👌🏾👌🏾👌🏾

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Rupesh Kumar

18-Feb-2024 06:08 PM

बहुत खूब

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